केजरीवाल की जीत के मायने पढिए राजनैतिक विश्लेषक रिज़वान एजाज़ी की ज़ुबानी

आज़ाद हिंदुस्तान में इतना चुनौती भरा चुनाव कभी नहीं हुआ। जहाँ एक तरफ़ गिने चुने नये नवेले नेता थे तो, दूसरी तरफ़ देश के सबसे अधिक धनी, चतुर, शक्तिशाली नेताओं की टीम, देश के सर्वाधिक ज्वलन्त मुद्दे पर भावनात्मक गर्माहट देती बीजेपी। चुनाव आयोग, बिकाऊ मीडिया, कठपुतली पुलिस-प्रशासन जैसी पंगु संस्थाएँ एक तरफ़ और अपने पिछले कार्यकाल को बेबाकी से मतदाताओं के सामने रखते हुए केजरीवाल दूसरी तरफ़। और परिणाम रहा शानदार विजय। क्या यह अचानक या अप्रत्याशित हुआ ? बिल्कुल नहीं।

केजरीवाल और उनकी टीम ने हर व्यक्तिगत और गम्भीर आरोप का बड़ी सफ़ाई से सामना किया और प्रारम्भ से जो विजय का आत्मविश्वास बनाया था उसे टूटने नहीं दिया। आत्मविश्वास किस बात का था ? जिस तरह से लगातार 5 वर्ष जनता की बुनियादी समस्याओं, आवश्यकताओं पर अपना ध्यान फ़ोकस रखते जनता की सुविधाओं में विस्तार करते चले गये। कई बार हैरानी होती थी कि केंद्र सरकार के असहयोग के बावजूद केजरीवाल सरकार ने अल्प साधनों और कम बजट के बावजूद इतने विकास कार्य किस प्रकार करवा लिये।

यदि देखा जाये तो केजरीवाल की जीत का सबसे बड़ा यही कारण रहा है… भृष्टाचार पर लगाम। जहाँ अधिकांशतः विकास की राशि भृष्ट नेताओं अधिकारियों और बिचौलियों की जेब में चली जाती है वहीं, इस सरकार ने सख़्ती से इस लूट को कंट्रोल किया और जनता को बिजली, पानी, यातायात, शिक्षा, स्वास्थ्य सहज सुलभ करवाये। जितना ये जनता के लिये करते गए वहीं उसका लगातार प्रचार भी करते रहे और मतदाताओं को मतदान के समय तक अहसास कराते रहे कि हमने काम किया है तो हमें वोट दो।

जितने भी विवादास्पद मुद्दे रहे या व्यक्तिगत हमले हुए उनपर केजरीवाल ने चुप्पी बनाये रखी और होशियारी से उनसे बचते चले गये और सबसे अंत में – केजरीवाल ने हमेशा अपनी ग़लती सार्वजनिक रूप से स्वीकारी और अपनी राहें बदल दीं जबकि देश का नेतृत्व इस समय अहँकार और हठ के फलस्वरूप बेहद खतरनाक स्थिति में पहुँच गया है।

केजरीवाल और उनकी आप टीम को शानदार जीत की हार्दिक बधाई…।