NPR-NRC-CAA और देश का भविष्य…?

हिंदुस्तान का गौरवशाली इतिहास रहा है कि पड़ौसी देश के नागरिक हमारे यहाँ शरण लेने आते हैं कोई भी नागरिक यहाँ से दूसरे देश शरण के लिये जाना नहीं चाहता। शरणार्थी की रक्षा के लिये जान की बाज़ी भी लगा दी गई है और विभिन्न संस्कृतियों के सम्मिश्रण से ही हिंदुस्तान विदेशियों के लिये आकर्षक का केंद्र बना रहा है ।

आज का हिंदुस्तान …

निश्चित रूप से देश बेरोजग़ारी, आतंकवाद, भृष्टाचार, जनसंख्या, नक्सलवाद, गऱीबी सहित बहुत सी समस्याओं से जूझ रहा है। बढ़ती जनसंख्या के बोझ से हम हमारी ही समस्याओं से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं तो दूसरे देशों से आने वाले नागरिकों का भार किस तरह सहन कर पायेंगे। 1971 के बाद से बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या व विवाद तभी से बना हुआ है। यह वास्तव में  चिंतनीय है जिस पर सरकार सहित हर नागरिक को विचार करना अनिवार्य है परन्तु CAA के संसद से पारित होते ही देश को ज़बरदस्त प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ रहा है ।

आखिऱ इतना विरोध क्यों ?

आइये जानने की कोशिश करते हैं। सबसे पहले जानिये…..

NPR…National Population Register (राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर) हर 10 वर्षों में देश की जनगणना की जाती है परन्तु इस बार यह अति महत्वपूर्ण है। 1अप्रैल 2020 से 30 सितंबर 2020 तक सरकारी कर्मचारी घर घर जाकर एक एक नागरिक के बारे में जानकारी जुटायेंगे जिनमे भारतीयों व ग़ैर भारतीयों की जानकारी भी शामिल है। NPR 28 फऱवरी 2021 तक पूर्ण कर लिया जायेगा। इसमें किसी को कोई आपत्ति भी नहीं होना चाहिये। परन्तु लाख मना करने के बावजूद भी यह तय है कि इस रजिस्टर के आधार पर ही NRC का कार्य प्रारंभ हो जायेगा क्योंकि सरकार के पास हर नागरिक की समस्त जानकारियाँ उपलब्ध हो चुकी होंगी ।

NRC…National Register of Citizens (राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) देश के हर नागरिक का पंजीयन है जिसमें उसकी समस्त जानकारी निहित होगी व 31 दिसम्बर 2014 तक पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफग़़ानिस्तान से जो अवैध शरणार्थी भारत में प्रवेश कर चुके हैं, उन्हें देश में नागरिकत प्रदान करने का प्रावधान है ।

CAA….Citizen Amendment Act (नागरिक संशोधन क़ानून) CAA के विरुद्ध सर्वाधिक विरोध हो रहा है। जब आसाम में  NRC लागू हुआ तब विभिन्न चरणों की छान बीन के बाद 19 लाख से अधिक बांग्लादेशी आसाम में पाये गये जिनमें से 11 लाख से अधिक हिन्दू हैं। उन्हें व देश के अन्य प्रांतों में  नागरिकता देने के लिये ष्ट्र्र संसद में पारित हुआ और जिस पर राष्ट्रपति ने मोहर लगा दी। CAA के अनुसार पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से 31 दिसम्बर 2014 के पूर्व जो भी हिन्दू, सिख, पारसी, जैन, ईसाई, बौद्ध (यानी मुस्लिम, यहूदी नहीं) भारत में धार्मिक उत्पीडऩ के कारण प्रवेश कर चुके हैं उन्हें बिना कोई दस्तावेज दिखाये नागरिकता दे दी जायेगी परन्तु जो मुस्लिम देश में घुसे हैं उन्हें  घुसपैठिया माना जायेगा ।

विरोध के कारण……

1. देश के संविधान के अनुच्छेद 14 के विपरीत है कि धार्मिक आधार पर कोई क़ानून नहीं बनाया जा सकता।

2. सबसे पहले पूर्वोत्तर राज्यों में CAA के विरोध में हिंसक प्रदर्शन हुए जो अभी तक जारी है, जिसमें बहुत सारी सरकारी संपत्ति नष्ट हो गई और कुछ व्यक्ति मारे भी गये। पश्चिमोत्तर राज्यों विशेषरूप से आसाम में असंतोष का कारण है कि वहाँ के नागरिकों को अपनी संस्कृति और साधनों पर इन शरणार्थियों के क़ब्ज़े का ख़तरा उत्पन्न हो गया। उसके बाद देश के अन्य भागों में धीरे धीरे यह  आंदोलन फैलता चला गया। आंदोलन कई जगह अत्यधिक हिंसक हो उठा, सार्वजनिक संपत्ति को हानि पहुँचाई गई, कार्यवाही में 28 व्यक्तियों की जान चली गई। हज़ारों व्यक्तियों को जेल में डाल दिया गया व उन पर मुक़दमे लाद दिये गये।

आसाम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) किस तरह अस्तित्व में आया ?

1600 करोड़ सरकारी रुपये खर्च कर 55 हज़ार कर्मचारियों की मेहनत और लाखों कागजों की खानापूर्ति के बाद आसाम में यह कार्य पूर्ण हुआ। अब क्या होगा ? 3D- डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट यानी पहचान, मतदाता सूची से नाम हटाना, सरकारी योजनाओं से नाम ख़ारिज करना और उनकी संपत्ति छीन कर देश के बाहर निकाल देना या डिटेंशन केम्प के अंदर ठूँस देना। जी हाँ! उन्हीं डिटेंशन केम्पस में जिनके बारे में 22 दिसम्बर को प्रधानमंत्री जी ने दिल्ली में NRC और डिटेंशन केम्पस को झूठ है, झूठ है, झूठ है कहा था ।

NRC व CAA किस तरह पूरे देश में लागू होगा?

1अप्रैल 2020 से 30सितंबर 2020 तक NRC या राष्ट्रीय जनसँख्या रजिस्टर के द्वारा देश के हर एक नागरिक की तमाम जानकारियाँ (आधार कार्ड, बैंक एकाउंट, राशन कार्ड, पासपोर्ट, जन्मस्थान व जन्मतिथि, पेनकार्ड, मतदान परिचय पत्र यहाँ तक कि माता-पिता तक कि जन्मतिथि, जन्मस्थल की जानकारियाँ) सरकार एकत्रित कर लेगी जिसके लिये 8500 करोड़ रुपये का बजट बनाया गया है और लाखों कर्मचारी अधिकारी इसी कार्य में व्यस्त हो जायेंगे। GST इतनी जटिल प्रक्रिया अपनाई गई है कि पचासों बदलाव के बाद भी आज तक देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं आ पाई है। गृहमंत्री लगातार कहे जा रहे हैं कि हम एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे, 2024 तक देश मे एक भी घुसपैठिया नहीं रहने देंगे। देश में एक बार फिर अफऱातफऱी का वातावरण बन गया है।

कुछ प्रश्न…….

1. आज से कुछ माह पहले तक देशवासी अपने रोजग़ार में व्यस्त था, आज अचानक NRC, CAA के पक्ष या विपक्ष में खड़ा हो गया है, क्या यह हमारी सर्वाधिक प्रमुख समस्या है?

– क्या देश की बेरोजग़ारी, भ्रष्टाचार, शिक्षा, स्वास्थ्य हमारी प्राथमिकता नहीं है?

– सरकार हर रोज़ रिज़र्व बैंक व सार्वजनिक उपक्रमों से रुपये माँग रही है, क्या समस्त राशि इस अभियान पर फूँक डाली जायेगी ?

– जब आसाम में ही 1600 करोड़ व्यय हुए हैं तो पूरे देश में 4 से 5 लाख करोड़ रुपये खर्च कर  लाखों कर्मचारी सिर्फ इसी कार्य में व्यस्त नहीं हो जायेंगे ?

– आधारकार्ड, जाति प्रमाण पत्र आदि के नामों में कितनी ग़लतियाँ आम बात है, और एक छोटी सी त्रुटि या किसी के द्वारा संदेह व्यक्त करने पर किसी की भी नागरिकता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लग जायेगा?

– नागरिकता सिद्ध करने के लिये भ्रष्टाचार, अराजकता, लंबी लंबी लाइनों की प्रक्रिया से देश के नागरिकों को नहीं गुजऱना पड़ेगा ?

2. बेशक पाकिस्तान, बंगलादेश, अफगानिस्तान से प्रताडि़त होकर हिन्दू भाई अपना उज्ज्वल भविष्य देखते हुए भारत में आते हैं तो यही अवसर भूटान, नेपाल, श्रीलंका, म्यामांर के हिन्दू भाइयों के लिये क्यों नहीं?

3. बिना विशेषज्ञों से विचार विमर्श किये नोटबन्दी की मार देश देख चुका है ।

4. क्या फिर से देश की जनता सरकारी कार्यालयों में लाइनें बना कर अपने कागज़ात बनाने के लिये नहीं खड़े हो जायेंगे?

5. पासपोर्ट, आधारकार्ड, राशनकार्ड, मतदाता परिचय पत्र से नागरिकता सिद्ध नहीं होगी, 1970 से पूर्व के जन्म प्रमाण पत्र अथवा भूमि के कागजात दिखाना अनिवार्य होंगे। आदिवासी, घुमन्तु जातियाँ, गऱीब झोपड़ीवाले, अपने घरों से दूर दराज कार्य करने वाले किस तरह ये सिद्ध करेंगे, क्या देश के समक्ष एक अराजक स्थिति नहीं बन जायेगी?

6. लाखों करोड़ों देशवासी निश्चित रूप से अपनी नागरिकता सिद्ध नहीं कर पायेंगे, उनका क्या हश्र होगा?

यदि कोई यह सोचता है कि इस अभियान से सिर्फ मुसलमान परेशान या प्रभावित होंगे तो बहुत ग़लत सोचते हैं। देश का एक एक नागरिक प्रभावित होगा यह आसाम ने साबित कर दिया है। तस्वीर देखी है आपने ? प्रावधान क्या हैं ? जो अपनी नागरिकता सिद्ध नहीं कर पाएंगे उनकी 1971 के बाद जो सम्पत्ति उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से बनाई है, उसे छीन ली जायेगी, उसके वोट देने के अधिकार छीन लिये जायेंगे, योजनाओं में से उन्हें हटा दिये जायेंगे। वो दूसरे दर्जे के नागरिक बन जायेंगे। दस्तावेज की कमी से लाखों करोड़ों मुसलमान घुसपैठिये और हिन्दू शरणार्थी नहीं बन जायेंगे? क्या मुसलमानों को दूसरे देश स्वीकर करेंगे ? नहीं फिर उन्हें डिटेंशन केम्पों में सपरिवार डाल दिया जायेगा। जो जुम्मन पंक्चर बना कर अपना और बच्चों का पेट पाल रहा था वह डिटेंशन केम्प का नारकीय जीवन जीने पर मजबूर हो जायेगा। कहाँ से आएगा उसके लिए जीवनयापन के साधन ? आखिर यह अभियान देश को कौन सी सदी में ले जायेगा ?

नोटबन्दी, जीएसटी से देश का आर्थिक ताना बाना टूट चुका है, घुसपैठिये बाहर निकालने की प्रक्रिया में बची खुची स्थिति भी समाप्त सी हो जानी है। एक ऐसा निर्णय जिसकी कल्पना भयावह है। किसी भी घुसपैठिये को बाहर निकालेंगे तो कहाँ ? कौन सा देश स्वीकर करेगा? उस स्थिति में उन्हें डिटेंशन केम्पस में डाला जायेगा। कहाँ हैं करोड़ों लोगों के लिये डिटेंशन केम्प ? फिर एक मात्र रास्ता है कि देश के करोड़ों लोगों से नागरिकता सिद्ध करने की आड़ में उनके मताधिकार, आरक्षण व जनकल्याणकारी योजनाओं से वंचित कर दिया जायेगा। यह बात जिस तरह लोगों की समझ में आती जा रही है, लोग अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिये इस आंदोलन में साथ जुड़ते जा रहे हैं ।

अंत में CAA-NRC समर्थको से मेरा प्रश्न है कि कुछ समय पूर्व तक जिस समस्या से हम अंजान थे, हमारे दैनिक जीवन में उसका कोई विशेष महत्व नहीं था, क्या वास्तव में देश की घुसपैठिया समस्या अचानक इतनी विकराल हो गई है कि आने वाले वर्षों में हम देश का विकास और अन्य समस्याओं की उपेक्षा कर मात्र इसके निदान में समस्त संसाधनों को झोंक देंगे? क्या घुसपेठियों को बाहर करने का कोई और रास्ता नहीं या घुसपैठिया ही हमारी सबसे प्रमुख समस्या है ? आसाम आजतक सामान्य स्थिति में नहीं आ पाया है। कई परिवार वहाँ बर्बाद हो गये हैं। अपनी नागरिकता सिद्ध करने की लंबी प्रक्रिया में लाखों रुपये एक एक व्यक्ति को ख़र्च करना पड़ रही है, आत्महत्याएं हो रही हैं। लाखों लोग अपनी मूलभूत समस्याओं को भूल चुके हैं और मात्र अपनी नागरिकता, सम्पत्ति, रोजग़ार, अधिकार बचाने की चिंता में घुले जा रहे हैं और यही कारण है कि ऐसी ही स्थिति की आशंका से शहर शहर में शाहीन बाग़ जैसे आंदोलन खड़े हो रहे हैं। विदेशों में हिंदुस्तान की छवि बिगड़ती जा रही है। आने वाला समय देश के लिये वास्तव में चिंताजनक है।