मेरी नज़र में मोहब्बत के पीछे का सच- रिज़वान एज़ाजी

कायनात, सृष्टि का अस्तित्व वंश वृद्धि पर ही निर्भर है और वंश वृद्धि तब तक सम्भव नहीं जब तक कि इसमें भावनायें नहीं जुड़ जाती हैं, इंसान ने अपने ऐशोआराम के लिये कम्प्यूटर, रोबोट सब ईजाद कर लिये लेकिन जो जीव और निर्जीव में अंतर है उसका आविष्कार नहीं कर पाये और वह हैं –भावनायें, जज़्बात। भावनायें चाहे ममता की हों या प्रेम की, इनके अस्तित्व पर ही संसार टिका हुआ है और मेरी नज़र में यही “मोहब्बत” है।

मोहब्बत के लिये मनुष्य से लेकर हर जीव में दो जनों का होना अनिवार्य है और चूँकि वैज्ञानिक नियम कहता है- जीवन संघर्ष। यानि वंश वृद्धि हेतु सर्वश्रेष्ठ को विजेता बनाये जाने के पक्ष में वातावरण और शारीरिक गठन का निर्माण किया गया है। जहाँ नर को बलशाली और संघर्ष करने हेतु मज़बूत बनाया गया है वहीं मादा को कोमल और आश्रिता रूप दिया गया है। चूँकि श्रेष्ठतम वंश आगे बढ़ाया जाये, प्रकृति ने नर में इस तरह के हार्मोन विकसित किये हैं जिनसे वह प्रतिकूल वातावरण से स्वयं को व अपने आश्रितों को सुरक्षित रखने में सक्षम हो, वहीं मादा में श्रेष्ठ नर पर आश्रित होने व उसे आकर्षित करने की शक्ति प्रदान की है। चूँकि मादा ही वंश वृद्धि की मुख्य वाहक है अतः उसको कोमल परंतु उस लता समान मानसिकता के हार्मोन से सजाया है जो अपने निकट तने को जकड़ कर उसके अस्तित्व पर छा जाना चाहती है। शारीरिक रूप से अवश्य वह कोमल परन्तु भावनात्मक रूप से बेहद मज़बूत उसकी रचना की गई है। वह सर्वश्रेष्ठ नर को चुनने को ही इच्छुक रहती है ताकि वंशावली और भी अधिक उत्तम और परिस्थितियों से संघर्ष में सक्षम सन्तान को जन्म दे सके।

परन्तु नर की मानसिकता बिलकुल भिन्न है, वह मादा की ओर आकर्षित होता है, उसको हासिल करने को इच्छुक भी रहता है, उससे सम्बंध भी बनाता है, परन्तु वंश वृद्धि की ओर उसको कोई विशेष रूचि नहीं रहती। आप ने पढ़ा, सुना होगा कि ऋतुकाल में शेर अपने बच्चों को ही मार डालता है ताकि शेरनी का ध्यान बच्चों पर से हट जाये और वह शेर की ओर आकर्षित हो सके। वहाँ शेरनी अपने बच्चों को सुरक्षित रखने हेतु शेर से सामना करने पर आमादा हो जाती है। शेर यह भी बर्दाश्त नहीं कर सकता कि शेरनी किसी दूसरे शेर के संसर्ग में आये और यहीं दो शेरों में इतनी भयानक लड़ाई देखी जाती है जिसमें एक शेर अपनी जान तक गवाँ देता है और यही सिद्ध होता है जीवन संघर्ष (survival for existence)|

अब हम जीवों से आगे बढ़ कर मनुष्य पर स्वयं को केंद्रित करते हैं । आदिकाल से महिला भी सर्वश्रेष्ठ पुरुष की ओर आकर्षित हुई है ताकि श्रेष्ठ वंश को आगे ले जा सके। धीरे धीरे मनुष्य सामाजिक प्राणी बनता गया, जहाँ उसे समूह में रहना अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक लगा, जिससे बस्तियों का निर्माण हुआ। बस्तियों में भी बलशाली पुरुषों का ही दबदबा रहा, संघर्ष वहाँ भी भयानक हुए, जिनके कारण बस्तियों में नियम बनने लगे, सामाजिक ताना बाना स्थापित होने लगा ताकि संघर्ष, लड़ाई, झगड़े कमसे कम हों और वहीं से जोड़े बनना प्रारम्भ हुए। चूँकि नारी प्रारम्भ से सर्वश्रेठ की ओर आकर्षित होती रही, तो बलशाली पुरुष एक से अधिक नारियों को अपने अधीन रखना अपना अधिकार समझने लगा। कालांतर में राजा महाराज, बादशाह, नवाब अपने प्रभाव और सम्पन्नता के प्रभाव से अनेकों रानियों, बेगमों से हरम को सुशोभित करने लगे। समय बदलता गया परन्तु पुरुष मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया। हाँ ! श्रेष्ठ पुरुष की परिभाषा समयानुसार बदलती गई। श्रेष्ठ पुरुष को नियंत्रित करने में धर्म का भय ज़बरदस्त प्रभावशाली रहा। पाप, नरक के डर ने उसे अपनी सीमा में रहने पर विवश कर दिया। कभी बलशाली व्यक्ति सर्वाधिक प्रभावी होता था परन्तु समाज के निर्माण के साथ साथ शक्ति का रूप लाठी, भाला से परिवर्तित होते हुए बन्दूक, टैंक तक पहुँच गये। वैज्ञानिक युग में भौतिक सुख साधनों के विस्तार के साथ ही अधिकतर नारी बलशाली पुरुष के स्थान पर सफल, बुद्धिमान, सेलिब्रिटी, सम्पन्न पुरुष में अपना भविष्य अधिक सुरक्षित अनुभव करने लगी।

स्त्री पुरुष के सम्बंध आदिकाल से आज तक ज्यों के त्यों चले आ रहे हैं। स्त्री आज भी अपने जीवनसाथी के प्रति पूर्ण समर्पिता रहना चाहती है, वहीँ पुरुष उतनी वफ़ादारी प्रदर्शित नहीं करता जितनी नारी कर दिखाती है और सामाजिक बन्धनों में अधिकांश विवाद और सम्बंध विच्छेद के कारण भी यही होते हैं। समय के साथ साथ नारी स्वतंत्रता या आत्मनिर्भरता ने अपने तेवर बदले हैं परन्तु अधिकांशतः आज भी नारी अपने प्रेमी या जीवनसाथी पर अपना आधिपत्य जमाना अपना अधिकार समझती है और पुरुष भी आज अपने आप को जंगल के खुले शेर की तरह व्यवहार करने का प्रयास करता है ।

वैज्ञानिक आधार पर ये मेरे निजी विचार हैं, आवश्यक नहीं कि पाठक इससे सहमत हों परन्तु विपरीत लिंगी आकर्षण ही प्रेम मोहब्बत का पर्यायवाची है, ममता का रूप परिवर्तित होकर वंश को सुरक्षित रखने की भावनायें हैं और जीवनसंघर्ष प्रेम की भावनाओं का उदगम।