अगर गाँधीजी आज जि़ंदा होते….!

इंग्लैंड से बैरिस्टरी की शिक्षा प्राप्त कर संकोची स्वभाव के गांधीजी राजकोट, बम्बई में वकालत करने में असफल रहे तभी सेठ अब्दुल्लाह के मुक़दमे के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका पहुँचे। गाँधीजी ने जिस ईमानदारी और मेहनत से मुक़दमे को हल किया उससे अब्दुल्लाह सेठ ने बहुत खुश होकर गाँधी जी के सम्मान में विदाई भोज का आयोजन किया। गाँधी जी वहाँ अखबार पढ़ रहे थे जिसमें एक छोटी सी ख़बर छपी थी कि नेटाल में भारतीयों का मताधिकार छीनने का क़ानून बनने जा रहा था। वहाँ उपस्थित जनों को गाँधी जी ने इसकी जानकारी दी तो सभी हैरान रह गए और गाँधीजी को वहीं रुक कर इस क़ानून के विरुद्ध संघर्ष करने की अपील करने लगे। एक छोटी सी ख़बर ने गाँधी जी का जीवन बदल दिया। गाँधी जी वहीं रुक गये और उस काले क़ानून को समाप्त करने तक संघर्ष करते रहे। इस संघर्ष की गूँज ने भारत में गाँधी जी की पहचान बनाई ।

1906 में दक्षिण अफ्रीका के ट्रांसवाल सरकार ने एशियाई क़ानून संशोधन अध्यादेश लागू किया जिसके अंतर्गत 8 वर्ष से ऊपर के एशियन पुरुष महिलाओं को एक रजिस्टर में अपना नाम दर्ज करवाने के लिये अंगुलियों के निशान देकर परिचय पत्र प्राप्त करने का प्रावधान था, उक्त परिचय पत्र हमेशा अपने साथ रखने का आदेश भी दिया गया। एशियन नागरिक मुख्य रूप से भारतीयों को इसका निशाना बनाया गया। इस काले क़ानून के विरुद्ध गाँधी जी के नेतृत्व में संघर्ष किया गया जो 1914 तक लगभग 6 वर्ष चला। इस अहिंसात्मक आंदोलन से ही ‘सत्याग्रह’ शब्द का जन्म हुआ। संक्षिप्त में गाँधीजी पर जानलेवा हमले, जेल यात्रा, कई बार उपवास से लेकर अनेक कष्ट भारतीयों को झेलने पड़े परन्तु सत्याग्रह तब तक जारी रहा जब तक कि काला क़ानून वापिस नहीं ले लिया गया। गाँधी जी के इसी अहिंसात्मक संघर्ष ने भारत की आज़ादी का मार्ग प्रशस्त हुआ ।

गाँधी जी का यह संघर्ष दक्षिण अफ्रीका में एशियन नागरिकों को नागरिकता साबित करने के विरुद्ध था यदि वे आज जीवित होते तो देखते कि हिंदुस्तान के धर्मनिरपेक्ष संविधान की रक्षा करने की शपथ लेकर संसद में बहुमत से क़ानून पारित होता है जिसमें निर्णय लिया जाता है कि अमुक देश का नागरिक हिंदुस्तान में  प्रवेश करता है तो यदि वह हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी धर्मावलम्बी है तो शरणार्थी है और मुसलमान है तो घुसपैठिया। दक्षिण अफ्रीका ने तो मात्र एशियन नागरिकों को नागरिकता प्रमाण पत्र प्रदान करने की कवायद की थी, वहाँ तो जाति कोई विषय नहीं था ही नहीं, हिंदुस्तान में तो उन घुसपैठियों, शरणार्थियों को पहचानने के लिये देश के हर नागरिक को अपनी नागरिकता साबित करने के लिये लाइनों में लगना होगा यदि वह अपनी पहचान साबित नहीं कर पाया तो या तो घुसपैठिया हो जायेगा या शरणार्थी। वह अब सरकारी मशीनरी के रहमोकरम पर हिंदुस्तानी रह सकता है। आसाम उदाहरण है जहाँ वर्षों से रहने वाले लोग अपनी पहचान सिद्ध नहीं कर पाये। 

काला धन बाहर निकालने के नाम पर लाखों करोड़ों रुपये बर्बाद कर इस देश के नागरिक लंबी लंबी लाइनों में खड़े होकर देख चुके हैं कि कितना काला धन बाहर निकला है। अब स्थिति उससे भी अधिक भयावह होने की संभावना बन रही है क्योंकि अब हमला उसके बैंक में जमा रुपयों पर नहीं उसके अस्तित्व पर होने जा रहा है। नोटबन्दी की पंक्तियों में कोई धनाढ्य नहीं लगा था, देश का निर्धन नागरिक लगा था जिसका कोई धर्म नहीं था, और अब भी वही हर धर्म का गऱीब नागरिक अधिकांश जिसके पास न भूमि है न दस्तावेज न उसके न उसके माता पिता के जन्मप्रमाण पत्र। जिस तरह सरकार अपनी जि़द पर अड़ी हुई है हर गाँधीवादी नागरिक को अपने अंदर गाँधी को जीवित करना होगा और तब तक संघर्ष करना होगा जब तक कि यह अमानवीय क़ानून वापिस नहीं हो जाता है ।