अब सडक़ पर आने की बारी कमलनाथ की- रिज़वान ऐजाज़ी

कमलनाथ ने सडक़ पर उतरने को कहा था। अब सडक़ पर आने की बारी कमलनाथ की है। यह पटकथा उसी दिन लिख दी गई थी जिस दिन कमलनाथ ने ज्योतिरादित्य की किसानों की मांगों को लेकर चेतावनी को नजऱअंदाज़ कर कहा था कि उतर जाओ सडक़ पर। ज्योतिरादित्य सिंधिया सोने की चम्मच मुँह में लेकर पैदा हुए हैं। हमेशा स्वयं एक महत्वपूर्ण, शक्तिशाली रहे हैं और लोगों से घिरा हुआ पाया है। मुझे नहीं लगता कि वो कांग्रेस से सहज ही जुदा हुए हैं। आखिऱ वर्षों उसी वातावरण में साँस लेते रहे हैं, जहाँ उन्हें मान सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है।

सत्ता में मंत्री पद की व्यस्तता कहिये या मोदी की आंधी, राहुल गाँधी सहित कई दिग्गज चुनाव हारे जिनमें ज्योतिरादित्य भी अपने ही एक कार्यकर्ता से पराजित हो गये। मध्य्प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ, निश्चित रूप से बहुत से नेताओं, कार्यकर्ताओं की अथक मेहनत से कांग्रेस सरकार बनी जिनमें ज्योतिरादित्य की मेहनत को भी नजऱअंदाज़ नहीं किया जा सकता परन्तु मुख्यमंत्री सिर्फ एक ही बन सकता था, यह ताज कमलनाथ के सिर पर रखा गया और तभी से सिंधिया हाशिये पर पहुंचा दिये गये। इनका असन्तोष समय समय पर सामने आ रहा था, टकराव ज़ाहिर हो रहा था परंतु विषय की गम्भीरता न कमलनाथ ने महसूस की न ही आलाकमान ने। आलाकमान स्वयं अपनी और पार्टी की हार से अवसाद में चले गये थे। महाराजा जो प्रारम्भ से सत्ता को ही अपने जीवन मे देख रहे थे, बड़े पद की इच्छा करने के हक़दार थे। सत्ता परिवर्तन में उनका योगदान था, परन्तु ऐसा नहीं हुआ।

अधूरे मन से राजनीति करने वाले राहुल गाँधी और प्रियंका गांधी की अति निकटता भी उनकी मनोस्थिति को दुरुस्त नहीं कर सकी और हर हाल में या येन केन प्रकरेण हर प्रदेश में अपनी सरकार की लालसा रखने वाली भाजपा लगातार किसी भी प्रदेश की विपक्षी पार्टी के किले में सेंध लगाने की हर सम्भव कोशिश करती रही, उनके प्रयास सार्थक रहे और कमलनाथ के अहंकारी वक्तव्य ने आग में घी का काम किया कि उतरने दो सडक़ों पर। ज्योतिरादित्य अपने मूल संगठन, मित्रता भूल कर भाजपा की गोदी में समा गये, भाजपा में उनका भविष्य कितना उज्ज्वल रहेगा यह तो आने वाला समय बतायेगा परन्तु अगले 4 वर्ष तो वे मंत्री पद और राज्यसभा के सदस्य का आनन्द लेंगे ही।

संकट के समय कांग्रेस को अपनी इस ग़लती का और ज्योतिरादित्य की उपेक्षा का परिणाम वैसे ही भुगतना पड़ेगा जैसे शरद पंवार, ममता बनर्जी, जगनमोहन रेड्डी और पी.ए. संगमा जैसे  नेताओं की अनदेखी के कारण कई प्रदेशों में कांग्रेस की दुर्दशा का सामना करना पड़ रहा है। यह डेमेज कंट्रोल हो सकता था यदि कमलनाथ दूरदर्शिता दिखाते, क्या उन्हें यह आभास तक नहीं था कि 20-25 विधायक किस तरह ज्योतिरादित्य के प्रभाव में हैं जिनमे उनके ही मन्त्रिमण्डल के कई सदस्यों ने अपने पद की भी परवाह नहीं की।

यहाँ मध्यप्रदेश के इस संकट का एक व्यक्ति और जि़म्मेदार है जिसने कभी ज्योतिरादित्य के उत्थान को बर्दाश्त नहीं किया और उनके कांग्रेस से जाने पर मंद मंद मुस्करा रहे हों, जो आज भले ही मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार के पतन के प्रति गम्भीर नहीं है, शायद उनका पुत्रमोह या स्वयँ की महत्वाकांक्षा उसकी जि़म्मेदार रही हों, जी हाँ दिग्विजय सिंह। बहरहाल जनता की भावनाएँ जिस भाजपा सरकार को सत्ताच्युत कर चुकी थी उसी भाजपा को फिर से मध्यप्रदेश में सरकार बनाते हम देखेंगे।