क्या जंगल छोडक़र सर्कस के शेर बनना चाहेंगे सचिन?

राजनीतिज्ञों को मध्य प्रदेश का राजनीतिक ड्रामा राजस्थान की राजनीति में उपरी तौर पर भले ही प्रभाव डालता नजऱ आ रहा हो लेकिन राजस्थान में गहलोत ही मुख्यमंत्री बने रहेंगे। जहां तक सवाल सचिन पायलट का है वे उप मुख्यमंत्री ही बने रहेंगे और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी बने रह सकते हैं। जो यह आकलन लगा रहे हैं कि  सचिन पायलट भी मध्य प्रदेश के ज्योतिरादित्य की तर्ज पर कोई नया खेल खेलेंगे तो फिलहाल जो घटनाक्रम है और जो परिस्थितियां है उसके अनुसार यह सही नहीं है। सचिन पायलट बेहद सुलझे हुए और समझदार राजनेता हैं। वे ऐसा कोई आत्मघाती फैसला नहीं करेंगे जिससे राजनीति में उनका पैर दलदल में पड़ जाएं। ज्योतिरादित्य और सचिन पायलट की राजनीतिक पृष्ठभूमि और संस्कारों में भारी अंतर है। सचिन के पिता राजेश पायलट एक शक्तिशाली राजनेता थे जिनको भावी प्रधानमंत्री के रूप में भी देखा जाने लगा था। जहां तक ज्योतिरादित्य के पिता माधव राव सिंधिया का सवाल है वे ठहरे हुए नेता थे। उनका क़द भी बहुत प्रभावशाली था मगर वे शुद्ध रूप से कांग्रेसी ख़ून से पैदा नहीं हुए थे। उनकी माता और अन्य सभी पारिवारिक सदस्य भाजपा से जुड़े रहे थे। इसलिये हम कह सकते हैं कि सचिन पायलट के ख़ून में केवल कांग्रेसी संस्कार हैं।

ज्योतिरादित्य, सचिन पायलट और राहुल गांधी परस्पर काफ़ी नज़दीकी मित्रता रखते रहे मगर ज्योतिरादित्य ज़रूरत से ज़्यादा महत्वाकांक्षी थे। वे ख़ुद को मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि राहुल का मुख्य प्रतिद्वंदी मानते थे। जहां तक सचिन पायलट की महत्वाकांक्षाओं का सवाल है उन्होंने खुद को राहुल गांधी का कभी विकल्प नहीं माना। उन्होंने राजस्थान का मुख्यमंत्री बनने का सपना ज़रूर देख रखा है मगर इससे ज्यादा उन्होंने राहुल गांधी पर ही ये फैसला छोड़ा हुआ है।  ज्योतिरादित्य राहुल गांधी को भी अपने सामने कद्दावर नहीं मानते थे। उन्होंने मुख्यमंत्री कमलनाथ को नीचा दिखाने की कोशिश की। सांसद का चुनाव हार जाने वाले ज्योतिरादित्य का दिमाग पिछले लंबे समय से विचलित हो चुका था। सत्ता की भूख उनके सर पर चढक़र बोल रही थी। जबकि सचिन पायलट राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को अपने सामने पचा नहीं पा रहे थे। अब जबकि मध्य प्रदेश में भाजपा ने कांग्रेस को पटकनी दे दी है तब राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भाजपा अब राजस्थान में तोड़ फोड़ और गहलोत विरोधी खेल खेलेगी।  चर्चा तो यह भी है कि सचिन पायलट को ज्योतिरादित्य की तरह सपने दिखाकर भाजपा में शामिल किए जाने का खेल भी दिखाया जाएगा। मगर जानकारो के अनुसार सचिन पायलट राजनीति ख़ुदकुशी का कोई खेल नहीं खेलेंगे बल्कि भाजपा राजस्थान से पहले महाराष्ट्र में नया खेल खेलेगी । 

सचिन पायलट मध्य प्रदेश की घटना के बाद शतरंज के बुद्धिमान खिलाड़ी की भूमिका निभाते हुए पार्टी के अंदर रहकर ही गहलोत की ताक़त को कमज़ोर करने की कोशिश करेंगे।  ज्योतिरादित्य के साथ कई मंत्रियों और विधायकों का साथ था लेकिन सचिन पायलट के पास अभी जितने विधायकों की ताक़त है उससे गहलोत को सत्ता मुक्त तो नहीं किया जा सकता।  सचिन जानते हैं कि यदि उन्होंने कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों को भी अपने साथ लेकर गहलोत तक पहुंचने की कोशिश की तो भी वे मुख्यमंत्री पद को छू नहीं पाएंगे। कांग्रेस पार्टी राजनीतिक सदमे में हैं और सचिन पायलट इस बात का पूरा लाभ उठाएंगे। ज्योतिरादित्य के भाजपा में जाने के बाद वे दिल से खुश होंगे क्योंकि अब तो वे इकलौते राजकुमार रह जाने से और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं। हाईकमान अब दूसरा ज्योतिरादित्य पैदा नहीं करना चाहेगा। इसलिए सचिन को वह सर पर बैठाने तक से बाज़ नहीं आएंगे।

अब सचिन पायलट पार्टी में मजबूत हो जाएंगे। उनकी क्षमता बढ़ेगी। वे जो जि़द्द करेंगे वो पूरी होगी ऐसे में वर्तमान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की परेशानियां बढ़ेंगी। वे पहले से ही अपना वजूद बचाए रखने के लिए जिस तरह अपने मंत्रिमंडल के कई नापसंद मंत्रियों का कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे? मंत्रिमंडल में अपेक्षित रद्दोबदल नहीं कर पा रहे। राजनीतिक नियुक्तियां नहीं कर पा रहे। अब मध्य प्रदेश के ड्रामे के बाद तो वे और भी मजबूर और कमज़ोर हो जाएंगे। सचिन पायलट का कद बढऩे से राज्य के छोटे-बड़े नेताओं की फ़ौज़ उनको ज्यादा तरज़ीह देने लगेगी। हाईकमान भी सचिन की जगह गहलोत को दबाएगा। इससे गहलोत विचलित होकर कोई ऐसा फ़ैसला कर बैठेंगे जो सचिन पायलट चाहते हैं। जो सचिन को जानते हैं वे इस बात से वाकिफ़ है कि वे कोई भी कार्रवाई करने में जल्दबाजी नहीं करेंगे। क्योंकि इस घटना से पायलट का प्रभाव बढ़ेगा इसलिए नौकरशाहों पर भी उनका प्रभाव बढ़ेगा ज़ाहिर है। ज्योतिरादित्य ने जो कुछ किया कर दिया। जंगल के शेरों में यदि सर्कस का शेर भर्ती हो जाए तो उसकी क्या हालत होती है? आप समझ सकते हैं। सचिन ऐसा नहीं करेंगे क्यों कि वे जंगल के शेर हैं सर्कस के नहीं।

– सुरेन्द्र चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार