कांग्रेस पार्टी छोडने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के बारे में जानिए कुच दिलचस्प बातें

कांग्रेस पार्टी महासचिव और युवा नेताओं में एक ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ठीक होली के दिन पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया, जिसके बाद मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार पर संकट के बादल गहरा गए हैं. उनके साथ कांग्रेस के क़रीब 19 विधायकों ने भी अपने इस्तीफ़े दे दिए हैं. इधर कांग्रेस ने तुरंत प्रभाव से ज्योतिरादित्य को पार्टी से निकालने का ऐलान कर दिया है. इसके बाद अब उनके बीजेपी में शामिल होने की अटकलें तेज़ हो गई हैं. इससे पहले मंगलवार को ज्योतिरादित्य ने दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से मुलाक़ात की थी. ज्योतिरादित्य बीते 18 सालों से कांग्रेस के साथ रहे हैं. उनके पिता माधवराव सिंधिया भी पार्टी के आला नेताओं में शुमार किए जाते थे.

देश के सबसे अमीर राजनेता

सिंधिया परिवार मध्य प्रदेश के शाही ग्वालियर घराने से आता है और उनके दादा जीवाजी राव सिंधिया इस राजघराने के अंतिम राजा थे. सिंधिया देश के सबसे अमीर राजनेताओं में गिने जाते हैं जिनकी संपत्ति 25,000 करोड़ रुपए आंकी जाती है जो उन्हें विरासत में मिली. उन्होंने इस संपत्ति का स्रोत क़ानूनी उत्तराधिकार बताया है जिसे उनके परिवार के दूसरे सदस्यों ने अदालत में चुनौती दी है.

पिता ने तैयार की बनाई राजनीतिक विरासत

30 सितंबर 2001 को ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया की उत्तर प्रदेश में एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत हो गई. वे मध्य प्रदेश की गुना सीट से सांसद थे. 1971 के बाद होने वाला कोई भी चुनाव वो नहीं हारे. वे गुना से नौ बार सांसद चुने गए. 1971 में उन्होंने जन संघ के टिकट पर चुनाव लड़ा था. इसके बाद इमर्जेंसी के बाद साल 1977 में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा. उनकी मां किरण राज्य लक्ष्मी देवी नेपाल राजपरिवार की सदस्य थीं. ज्योतिरादित्य की शादी मराठा वंश के गायकवाड़ घराने में हुई है.

पिता की मृत्यु के बाद राजनीति में कूदे

2001 में पिता माधवराव के निधन के तीन महीने बाद ज्योतिरादित्य कांग्रेस में शामिल हो गए और इसके अगले साल उन्होंने गुना से चुनाव लड़ा जहाँ की सीट उनके पिता के निधन से ख़ाली हो गई थी. वो भारी बहुमत से जीते. 2002 की जीत के बाद वो 2004, 2009 और 2014 में भी सांसद निर्वाचित हुए. ज्योतिरादित्य केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकारों (2004-2014) में मंत्री रहे. 2007 में उन्हें संचार और सूचना तकनीक मामलों का मंत्री बनाया गया, 2009 में वे वाणिज्य व उद्योग मामलों के राज्य मंत्री बने और 2014 में वे ऊर्जा मंत्री बने. उनकी छवि एक ऐसे मंत्री की थी जो सख़्त फ़ैसले लेता था. वे यूपीए सरकार में एक युवा चेहरा भी थे.

बचपन से क्रिकेट प्रेमी रहे

क्रिकेट के शौक़ीन ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश क्रिकेट संघ के अध्यक्ष हैं. वे देश के क्रिकेट संघों के संचालन को लेकर नाख़ुश रहे हैं और ख़ास तौर से स्पॉट फ़िक्सिंग मामलों को लेकर उन्होंने अपनी आपत्ति ज़ाहिर की थी. उनकी आपत्तियों के बाद संजय जगदले को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के सचिव पद से हटना पड़ा था.

अपने निजी सचिव से लोकसभा चुनाव हारें

साल 2014 में जब पूरे देश में मोदी लहर की चर्चा हो रही थी उस वक्त कांग्रेस के कुछ ही नेता लोकसभा चुनाव जीते थे. उनमें से एक थे ज्योतिरादित्य सिंधिया थे जो गुना की सीट से जीते थे. लेकिन लगातार चुनाव प्रचार के बाद भी 2019 लोकसभा चुनाव में वो इस सीट से हार गए. उनके मुक़ाबले में बीजेपी के टिकट पर कृष्णपाल सिंह यादव खड़े थे जो पहले उनके निजी सचिव रह चुके थे.

मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने की चाह

मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के दौरान हुई रैलियों में ज्योतिरादित्य सिंधिया को राहुल गांधी और कमल नाथ का साथ मिला था. जानकार मानते हैं कि चुनाव के नतीजे उनके पक्ष में नहीं रहे फिर भी वो प्रदेश के मुख्यमंत्री बनना चाहते थे. कांग्रेस आला कमान ने उनकी बात मान ली थी और उन्हें आधे से अधिक विधायकों का समर्थन साबित करने को कहा था. वो केवल 23 विधायकों का समर्थन ही साबित कर सके जिसके बाद प्रदेश का मुख्यमंत्री कमलनाथ को बनाया गया.