क्यों कमज़ोर पड़ रहा है पंजे का शिकंजा

कांग्रेस पार्टी पिछले काफी समय से संकट के दौर से गुजऱ रही है। बेशक बीते दिनों में कांग्रेस कुछ अहम राज्यों में सत्ता कब्ज़ाने में सफल रही है, लेकिन पार्टी लोकप्रियता और संगठन के विस्तार के मामले में लगातार झटके झेल रही है। पार्टी के कई बड़े नेता देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टियों में से एक कांग्रेस से नाता तोड़ रहे हैं। अब ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे कद्दावर नेता के जाने से कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है।

जड़ता का माहौल

कांग्रेस पार्टी में पूर्णकालिक अध्यक्ष का पद खाली है और फिलहाल सोनिया गांधी पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर काम कर रही हैं। नेतृत्व की इस कमी के चलते पार्टी में जड़ता का माहौल देखने को मिल रहा है। भाजपा जहां चुनावी मशीनरी में तब्दील हो चुकी है, वहीं कांग्रेस में चुनाव को लेकर खास तैयारियां या योजना का अभाव दिखता है। इसके चलते पार्टी भाजपा का मुकाबला करने में खुद को असहाय पा रही है।

नए नेतृत्व को समर्थन नहीं मिलना

कांग्रेस की जो सबसे बड़ी समस्या मानी जा रही है, वो ये है कि पार्टी में नए नेतृत्व को उभरने का मौका नहीं मिल रहा है। यही वजह है कि कई युवा नेता पार्टी से दूरी बना रहे हैं। राहुल गांधी जब कांग्रेस अध्यक्ष थे, तो उस दौरान कई युवा नेताओं को अहम जिम्मेदारियां दी गई, लेकिन जैसे ही राहुल ने अध्यक्ष पद छोड़ा, पार्टी में एक बार फिर से बुजुर्ग नेताओं का दबदबा बन गया है, जिसके चलते युवा नेता खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। कांग्रेस जहां लगातार रसातल में जा रही है, वहीं उसकी मुख्य विरोधी पार्टी भाजपा लगातार मजबूत हो रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि कांग्रेस कहां गलती कर रही है?

इसका उदाहरण ये है कि मध्य प्रदेश चुनाव में कांग्रेस ने प्रचार की अहम जिम्मेदारी ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंपी थी, जिसके बाद सिंधिया ने चुनाव में जमकर मेहनत की, लेकिन जब राज्य में कांग्रेस की सरकार बनी तो पार्टी आलाकमान ने सत्ता की कमान कमलनाथ के हाथों में सौंप दी। इसी तरह राजस्थान में सचिन पायलट ने पार्टी को मजबूत करने में खासी मेहनत की, जिसका पार्टी को फायदा मिला और राजस्थान में कांग्रेस सत्ता में वापसी करने में सफल रही। लेकिन एक बार फिर पार्टी ने युवा हाथों में कमान सौंपने के बजाय अशोक गहलोत को सीएम चुना। इसी तरह महाराष्ट्र में मिलिंद देवड़ा, उत्तर प्रदेश में जितिन प्रसाद जैसे नेता भी हाशिए पर जाते दिखाई दे रहे हैं।

पार्टी मैनेजमेंट में ख़ामी

भाजपा की ताकत मैन मैनेजमेंट है, जिसके चलते पार्टी में सामान्य कार्यकर्ता भी अपनी मेहनत के दम पर शीर्ष स्तर पर अपनी जगह बना रहे हैं। खुद पीएम मोदी, अमित शाह, नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह जैसे नेता इस बात के उदाहरण है। यही वजह है कि इसी फल की चाहत में पार्टी कार्यकर्ता भी पूरी मेहनत और ईमानदारी से पार्टी की सेवा करता है। वहीं कांग्रेस में परिवारवाद हावी है। पार्टी के कई अहम पदों पर या तो पार्टी के बुजुर्ग होते नेता काबिज हैं, या फिर नेताओं के नाते-रिश्तेदार। जब जमीनी कार्यकर्ता को पार्टी में तरक्की की उम्मीद दिखाई नहीं देती तो वह भी मेहनत और ईमानदारी से पार्टी के लिए प्रचार नहीं कर पा रहा है।