अजीब दौर से गुजऱ रहा है भारत- तवलीन सिंह

यह लेख न्यूयॉर्क से पहुंच रहा है आपके पास। पिछली बार जब यहां आई थी, तो न नागरिकता कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हुए थे और न दिल्ली में नफरत और हिंसा की आग सुलग रही थी। सो, नरेंद्र मोदी की छवि प्रवासी भारतीयों की नजरों में एक ऐसे राजनेता की थी, जो भारत को विकास और प्रगति के रास्ते पर ले जाने वाली थी। अब वह छवि नहीं है अपने प्रधानमंत्री की। अब वे लोग, जो कभी मोदी के सबसे बड़े प्रशंसक हुआ करते थे, चिंता व्यक्त करते हैं भारत के भविष्य को लेकर।एक प्रसिद्ध भारतीय डॉक्टर के घर गई थी मैं कल रात। मेहमानों में कई स्वदेशी थे, जो अमेरिका में दशकों से रहने के बाद भी हिंदुस्तान को रखते हैं अपने दिलों में। ज्यादातर ऐसे लोग थे, जो कल तक मोदी के कट्टर प्रशंसक हुआ करते थे। आज यही लोग बेझिझक कहते हैं कि पिछले कुछ महीनों से उनको लगने लगा है जैसे कि मोदी उस रास्ते से भटक गए हैं, जिस पर उन्होंने कभी चलने का वादा किया था। एक अर्थशास्त्री के शब्दों में, ‘हमने सपना देखा था कि मोदी के दौर में भारत की वह जगह बन जाएगी दुनिया में, जो उसकी होनी चाहिए, यानी कम से कम एक अर्ध-विकसित देश की। यह नागरिकता का जबसे सिलसिला शुरू हुआ है तबसे दुनिया की नजरों में भारत गिर-सा गया है।’

इस दावत में जिनसे भी मेरी बातें हुईं, चाहे वे स्वदेशी रहे हों या विदेशी, सबने एक आवाज में कहा कि दिल्ली के दंगों ने उनको हैरान कर दिया है। दंगे सुर्खियों में रहे हैं न्यूयॉर्क के अखबारों में और टीवी पर भी। सबका एक ही मत रहा है और वह यह कि दंगे करवाए गए थे, अपने आप नहीं हिंसा भडक़ उठी थी। यहां के मीडिया ने यह भी कहा है कि दिल्ली पुलिस की भूमिका पुलिस की कम और दंगाइयों की ज्यादा रही है। इन बातों को हजम कर ही रही थी मैं कि अगले दिन बीबीसी पर दिल्ली पुलिस के एक झुंड को दिखाया गया हिंसक भीड़ को उकसाते हुए।

पिछली बार न्यूयॉर्क आई थी मैं नरेंद्र मोदी का दूसरा कार्यकाल शुरू होने के कुछ महीने बाद। तब जिनसे मिली थी, सबने कहा था कि उनको पूरा विश्वास है कि इस बार मोदी डट कर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सुधार लाएंगे, ताकि भारत तेजी से विकसित देशों की श्रेणी में अपनी जगह बना सकेगा। अब मोदी के सबसे बड़े प्रशंसक भी मायूस दिखते हैं, क्योंकि उन्हें लगने लगा है कि मोदी की प्राथमिकताएं बदल गई हैं और उनकी नई प्राथमिकताएं भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाने की हैं, न कि एक आर्थिक महाशक्ति बनाने की। न्यूयॉर्क में मेरे स्वदेशी और अमेरीकी दोस्तों में सहमति है कि चीन की बढ़ती शक्ति विश्व के लिए हानिकारिक साबित हो सकती है, क्योंकि उस देश में लोकतंत्र का छोटा-सा चिराग भी अभी दूर तक दिखाई नहीं देता है। सो, भारत ही एक देश है, जो विश्व का संतुलन कायम रख सकता है अपने लोकतंत्र के बल पर।

अब इस लोकतंत्र को खतरा दिखने लगा है, इसलिए कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरियां सामने आई हैं पिछले कुछ महीनों में। हमारे शुभचिंतक भी परेशान हैं यह देख कर कि भारत के राजनेता खुल कर साबित कर रहे हैं कि वे सिर्फ हिंदुओं के नेता हैं, मुसलमानों के नहीं। दोष देते हैं मोदी को ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के बड़े राजनेताओं को और अरविंद केजरीवाल को भी। मुझसे बार-बार पूछा गया कि जब दंगे शुरू हुए थे दिल्ली में, तो केजरीवाल ने बतौर मुख्यमंत्री क्यों नहीं हिंसा से पीडि़त मुसलमानों के साथ हमदर्दी दिखाई? सवाल कांग्रेस पार्टी के तथाकथित सेक्युलरिज्म पर भी उठने लगे हैं, इसलिए कि घडिय़ाली आंसू बहाने के अलावा कांग्रेस के बड़े राजनेताओं ने कुछ नहीं किया है। पिछले हफ्ते राहुल गांधी ने हिंसा के खिलाफ आवाज पहली बार उठाई दिल्ली के दंगों के बाद, लेकिन दबी जुबान में। जैसे कुछ ऐसा कहने से बच रहे हों, जिससे उन पर मुसलमानों का हमदर्द न समझा जाए।

इतना जरूर कहा नेहरू-गांधी परिवार के वारिस ने कि नागरिकता कानून में किए गए संशोधन के बाद जो घटनाएं घटी हैं, उनसे गहरी चोट पहुंची है भारत की लोकतांत्रिक छवि को। इस बात में कोई शक नहीं है। न्यूयॉर्क में न सिर्फ प्रवासी भारतीय भारत की इस बदली छवि से परेशान हैं, बल्कि अमेरिका के बुद्धिजीवी और राजनीतिक पंडित भी चिंता व्यक्त करते हैं खुल कर।

लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि अगर हिंदू राष्ट्र में परिवर्तित होता है भारत, तो इस राष्ट्र में लोकतंत्र रहेगा या नहीं? उनको चिंता इस बात की है कि न्यायालयों पर भी दबाव दिखने लगा है सरकार का और पुलिस पर भी और ऐसा जब शुरू होने लगता है किसी लोकतांत्रिक देश में, तो साफ खतरा लोकतंत्र की नीव पर दिखने लगता है। लोग यह भी समझ नहीं पा रहे हैं कि अगर भारत में हिंदू राष्ट्र स्थापित होता है, तो इस हिंदू राष्ट्र में बीस करोड़ मुसलमानों की क्या जगह होगी। मुसलमानों को देश के गद्दार साबित करने की कोशिश जो अभी से शुरू हो गई है, वह भविष्य में कहां तक जाएगी।

अक्सर ऐसा होता है कि दूर किसी विदेशी शहर से जब नजरें उठती हैं अपने वतन की तरफ, तो वे चीजें स्पष्ट दिखने लगती हैं जो देश के अंदर रहते हुए धुंधली-सी दिखती हैं। इस बार न्यूयॉर्क में मेरे दोस्तों के सवालों और चिंताओं ने मुझे मजबूर किया खुद अपने से सवाल करने पर और जब यह प्रक्रिया शुरू हुई, तो मुझे उनकी चिंताएं सही लगने लगीं। अजीब दौर से गुजर रहा है भारत।